Bhagavad Gita 5.21 — 21

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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM

भगवद्गीता

A Timeless Guide to Life
अध्याय 5   |   श्लोक 21
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बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम् |स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते |
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bāhyasparśeṣvasaktātmā vindatyātmani yatsukham .sa brahmayogayuktātmā sukhamakṣayamaśnute

📖 सरल हिंदी अर्थ

बाहर के विषयों में आसक्ति रहित अन्तःकरण वाला साधक, आत्मा में स्थित जो ध्यान जनित सात्त्विक आनन्द है, उसको प्राप्त होता है; तदनन्तर वह सच्चिदानन्दधन परब्रह्म परमात्मा के ध्यान रूप योग में अभिन्नभाव से स्थित पुरुष अक्षय आनन्द का अनुभव करता है |

🌸 English Meaning

He whose mind remains unattached to sense-objects, derives through meditation the Sattvika joy which dwells in the mind; then that Yogi, having completely identified himself through meditation with Brahma enjoys eternal Bliss.

🪔 Life Lesson

इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।

Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 5, श्लोक 21
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्