Bhagavad Gita 3.17 — 17

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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM

भगवद्गीता

A Timeless Guide to Life
अध्याय 3   |   श्लोक 17
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यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः |आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते |
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yastvātmaratireva syādātmatṛptaśca mānavaḥ .ātmanyeva ca santuṣṭastasya kāryaṃ na vidyate

📖 सरल हिंदी अर्थ

परन्तु जो मनुष्य आत्मा में ही रमण करने वाला और आत्मा में ही तृप्त तथा आत्मा में ही सन्तुष्ट हो उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है|

🌸 English Meaning

He, however, who takes delight in the self alone and is gratified with the Self, and is contented in the self, has no duty.

🪔 Life Lesson

इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।

Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 3, श्लोक 17
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्