Bhagavad Gita 18.5 — 5

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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM

भगवद्गीता

A Timeless Guide to Life
अध्याय 18   |   श्लोक 5
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यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत् |यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् |
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yajñadānatapaḥkarma na tyājyaṃ kāryameva tat .yajño dānaṃ tapaścaiva pāvanāni manīṣiṇām

📖 सरल हिंदी अर्थ

यज्ञ, दान और तपस्वी कर्म त्याग करने के योग्य नहीं हैं, बल्कि वह तो अवश्य कर्तव्य है, क्योंकि यज्ञ, दान और तप—ये तीनों ही कर्म बुद्धिमान पुरुषों को पवित्र करने वाले हैं |

🌸 English Meaning

Acts of sacrifice, charity and penance are not worth giving up; they must be performed. For sacrifice, charity and penance—all these are purifiers of wise men.

🪔 Life Lesson

इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।

Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 18, श्लोक 5
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्