Bhagavad Gita 5.27 — 27
🔱
🔱
ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 5 | श्लोक 27
❖ ───── ✦ ───── ❖
स्पर्शान्कृत्वा बहिर्बाह्यांश्चक्षुश्चैवान्तरे भ्रुवोः |प्राणापानौ समौ कृत्वा नासाभ्यन्तरचारिणौ |
❧ ✦ ❧
sparśānkṛtvā bahirbāhyāṃścakṣuścaivāntare bhruvoḥ .prāṇāpānau samau kṛtvā nāsābhyantaracāriṇau
📖 सरल हिंदी अर्थ
बाहर के विषय-भोगों को न चिन्तन करता हुआ बाहर ही त्यागकर और नेत्रों की दृष्टि को भृकुटी के बीच में स्थित करके तथा नासिका में विचरनेवाले प्राण और अपानवायु को सम करके,
🌸 English Meaning
Shutting out all thoughts of external enjoyments, with the gaze fixed on the space between the eye-brows, having regulated the Pranaand the Apanabreaths flowing within the nostrils;
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 5, श्लोक 27
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
