Bhagavad Gita 18.45 — 45
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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 18 | श्लोक 45
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स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः |स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु |
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sve sve karmaṇyabhirataḥ saṃsiddhiṃ labhate naraḥ .svakarmanirataḥ siddhiṃ yathā vindati tacchṛṇu
📖 सरल हिंदी अर्थ
अपने-अपने स्वाभाविक कर्मों में तत्परता से लगा हुआ मनुष्य भगवद्प्राप्ति रूप परम सिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अपने स्वाभाविक कर्म में लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार से कर्म करके परम सिद्धि को प्राप्त होता है, उस विधि को तू सुन |
🌸 English Meaning
Keenly devoted to his own natural duty, man attains the highest perfection in the shape of God-Realization. Hear the mode of performance whereby the man engaged in his inborn duty reaches that highest consummation.
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 18, श्लोक 45
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
