Bhagavad Gita 18.44 — 44
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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 18 | श्लोक 44
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कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् |परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् |
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kṛṣigaurakṣyavāṇijyaṃ vaiśyakarma svabhāvajam .paricaryātmakaṃ karma śūdrasyāpi svabhāvajam
📖 सरल हिंदी अर्थ
खेती, गोपालन और क्रय-विक्रय रूप सत्य व्यवहार—ये वैश्य के स्वाभाविक कर्म हैं। तथा सब वर्गों की सेवा करना शूद्र का भी स्वाभाविक कर्म है |
🌸 English Meaning
Agriculture, rearing of cows and honest exchange of merchandise—these constitute the natural duty of a Vaisya. And service of the other classes in the natural duty of a Sudra.
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 18, श्लोक 44
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
