Bhagavad Gita 11.54 — 54
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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 11 | श्लोक 54
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भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन |ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप |
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bhaktyā tvananyayā śakya ahamevaṃvidho.arjuna .jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca parantapa
📖 सरल हिंदी अर्थ
परन्तु हे परंतप अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा इस प्रकार चतुष्पुर्ज रूप वाला मैं प्रत्यक्ष देखने के लिये, तत्त्व से जानने के लिये तथा प्रवेश करने के लिये अर्थात् एकीभाव से प्राप्त होने के लिये भी शक्य हूँ|
🌸 English Meaning
Through single-minded devotion, however, I can be seen in this form; nay, known in essence and even entered into, O valiant Arjuna.
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 11, श्लोक 54
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
