Bhagavad Gita 18.37 — 37
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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 18 | श्लोक 37
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यत्तदग्रे विषमिव परिणामेऽमृतोपमम् |तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुद्धिप्रसादजम् |
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yattadagre viṣamiva pariṇāme.amṛtopamam .tatsukhaṃ sāttvikaṃ proktamātmabuddhiprasādajam
📖 सरल हिंदी अर्थ
जो ऐसा सुख है, वह आरम्भकाल में यद्यपि विष के तुल्य प्रतीत होता है, परन्तु परिणाम में अमृत के तुल्य है; इसलिये वह परमात्मविषयक बुद्धि के प्रसाद से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक कहा गया है |
🌸 English Meaning
Such a joy, though appearing as poison in the beginning, tastes like nectar in the end; hence that joy, born as it is of the placidity of mind brought about by meditation on God, has been declared as Sattvika.
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 18, श्लोक 37
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
