Bhagavad Gita 15.15 — 15
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ॐ
श्रीमद्भगवद्गीता • SANATAN WISDOM
भगवद्गीता
A Timeless Guide to Life
अध्याय 15 | श्लोक 15
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सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टोमत्तः स्मृतिर्ज्ञानमपोहनञ्च |वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्योवेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् |
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sarvasya cāhaṃ hṛdi sanniviṣṭo mattaḥ smṛtirjñānamapohanañca .vedaiśca sarvairahameva vedyo vedāntakṛdvedavideva cāham
📖 सरल हिंदी अर्थ
मैं ही सब प्राणियों के हृदय में अन्तःयामी रूप से स्थित हूँ तथा मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन होता है और सब वेदों द्वारा मैं ही जानने के योग्य हूँ तथा वेदान्त का कर्ता और वेदों को जानने वाला भी मैं ही हूँ|
🌸 English Meaning
I am seated in the hearts of all; I am the beginning, the middle and the end of knowledge. I am memory, knowledge and forgetfulness. I am indeed the knower of the Vedas, and the author of Vedanta, and the remover of doubts.
🪔 Life Lesson
इस श्लोक के संदेश को अपने दैनिक जीवन में समझें और अपने कर्म, विचार तथा आचरण में अपनाने का प्रयास करें।
Source: श्रीमद्भगवद्गीता — अध्याय 15, श्लोक 15
“Do Your Duty. Leave the Rest to the Divine.”
ॐ तत्सत्
ॐ तत्सत्
